Monday, August 2, 2021
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इंदिरा ने अपने ‘तीसरे बेटे’ के लिए छिंदवाड़ा में मांगे थे वोट,अब सोनिया देंगी बड़ी जिम्मेदारी,

कमलनाथ की राष्ट्रीय राजनीति में वापसी के संकेत

कांग्रेस के केंद्रीय संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा

गुरुवार को सोनिया गांधी से कमलनाथ की मुलाकात के बाद शुरू हुई अटकलें

भोपाल/मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा अध्यक्ष कमलनाथ एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में वापसी कर सकते हैं। गुरुवार को कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनकी मुलाकात के बाद ऐसी अटकलें तेज हो गई हैं। ऐसी चर्चाएं हैं कि कमलनाथ को कांग्रेस संगठन में कोई बड़ा पद मिल सकता है। आंतरिक मतभेदों का सामना कर रही कांग्रेस के संगठन में बड़े पैमाने पर फेरबदल की संभावना है और इसमें कमलनाथ को बड़ी जिम्मेदारी मिलना तय माना जा रहा है।

सोशल मीडिया पर लोग उनके अगला कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की भी अटकलें लगाने लगे हैं।एमपी के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को कांग्रेस के केंद्रीय संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चाएं चल रही हैं। गुरुवार को कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनकी मुलाकात के बाद कमलनाथ की राष्ट्रीय राजनीति में वापसी के कयास लगने लगे हैं। तमाम संकटों से जूझ रही कांग्रेस के लिए कमलनाथ नए संकटमोचक की भूमिका में नजर आ सकते हैं।

हालांकि, इसके पहले भी कमलनाथ कांग्रेस पार्टी के लिए कई बार संकटमोचक की भूमिका निभा चुके थे। इसकी शुरुआत तो तभी हो गई थी जब कमलनाथ सांसद भी नहीं बने थे। 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे और उनकी सरकार ने इंदिरा को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। कहा जाता है कि संजय गांधी के साथ मिलकर कमलनाथ ने ही जनता पार्टी में फूट की पृष्ठभूमि तैयार की थी।

उन्होंने चरण सिंह को प्रधानमंत्री पद का लालच देकर पार्टी तोड़ने के लिए राजी किया था। मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई और सत्ता की कमान चरण सिंह को मिल गई लेकिन लोकसभा में विश्वास मत हासिल करने स पहले ही कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद 1980 में फिर से चुनाव हुए और कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई।

1980 में ही कमलनाथ ने पहली बार छिंदवाड़ा से चुनाव लड़ा था। तब उनके लिए वोट मांगने खुद इंदिरा गांधी छिंदवाड़ा आई थीं। उन्होंने कमलनाथ को अपना तीसरा बेटा बताया था। कानपुर में पैदा हुए और कोलकाता में पले-बढ़े कमलनाथ इससे पहले छिंदवाड़ा से पूरी तरह अनजान थे, लेकिन 1980 में शुरू हुआ उनकी जीत का सिलसिला आज तक जारी है। वे खुद नौ बार यहां से लोकसभा के लिए चुने गए। अभी उनके बेटे नकुलनाथ छिंदवाड़ा के सांसद हैं।

गांधी-नेहरू परिवार से नजदीकी कांग्रेस पार्टी में कमलनाथ को बड़ी जिम्मेदारी मिलने की चर्चाओं का अकेला कारण नहीं है। दूसरी पार्टियों के नेताओं से भी उनके नजदीकी रिश्ते हैं। वे काशीराम के जमाने से मायावती को जानते हैं। 1980 के दशक की शुरुआत में कांग्रेस के साथ डीएमके के गठबंधन में उनकी प्रमुख भूमिका थी। 2004 में डीएमके को यूपीए के साथ लाने में भी उनकी सबसे अहम भूमिका थी। ममता बनर्जी को भी वे यूथ कांग्रेस के दिनों से जानते हैं और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक उनके स्कूल के दिनों के मित्र हैं।

कांग्रेस फिलहाल तमाम अंतर्विरोधों से जूझ रही है। जी-23 के रूप में पार्टी के अंदर ही एक गुट पहली बार गांधी-नेहरू परिवार के नेतृत्व को चुनौती दे रहा है। पार्टी के जमे-जमाये नेताओं का दबदबा युवाओं को आगे आने से रोक रहा है। पिछले कुछ महीनों में कई बड़े नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। जो पार्टी में बने हुए हैं, वे भी अनिर्णय और नेतृत्वहीनता से असंतुष्ट हैं। कांग्रेस मुक्त भारत का सपना लेकर सत्ता में आई बीजेपी इस असंतोष को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। ऐसे में कांग्रेस के लिए दोहरी चुनौती है। पार्टी को अपना घर ठीक करने के साथ दूसरी पार्टियों का समर्थन भी हासिल करना है जिससे आने वाले चुनावों में एनडीए के सामने मजबूत चुनौती पेश की जा सके। ऐसी परिस्थिति में कमलनाथ सर्वश्रेष्ठ विकल्प हो सकते हैं।

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