Tuesday, June 15, 2021
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नमस्कार को प्रणाम!

अरे !अरे !बस ,बस रहने दो प्रणाम करने की जरूरत नहीं। “गले मिलो गले” आजकल के बच्चे हो हाथ मिलाओ।

यह दृश्य आजकल हर जगह देखने सुनने को मिलता है पर ऐसा करके हम अपनी पीढ़ी को अपनी परंपरा से दूर तो कर ही रहे हैं प्रणाम और नमस्कार का महत्व ही नहीं दिखा पा रहे हैं।

नमस्कार , नमस्ते , प्रणाम ये सब अभिवादन की भारतीय परंपराएं है।
इनको व्यक्त करने का तरीका जितना शालीन है इन शब्दों के अर्थ भी उतने ही सुंदर है संस्कृत के शब्द नमः+ ते से बना नमस्ते।
“नम:” का मतलब है नमन और “ते” का अर्थ है आपको । अर्थात मित्र हम आपके स्वागत में नतमस्तक हैं ।
जब अतिथि या मित्र के स्वागत में विनम्रता का भाव प्रकट करना है तो स्वत: ही हाथ जोड़कर नमस्कार कह उठते हैं और जब श्रद्धेय , गुरुजन आदरणीय का स्वागत करना हो तो प्रणाम कहते हुए चरण स्पर्श करने से श्रेष्ठ और क्या हो सकता है ‌?

यह परंपराएं केवल अभिवादन का तरीका बस नहीं है। इनमें विज्ञान भी निहित है ।
नमस्कार कहने के लिए दोनों हाथ जोड़ते हैं तो उंगलियों के घर्षण से उष्मा उत्पन्न होती हैं और हाथ हृदय के समीप रहते हैं । इस तरह हमारे यहां अतिथियों का स्वागत या मित्र तथा स्वजन का अभिवादन गर्मजोशी से तो किया जाता ही है दिल से भी किया जाता है।

प्रणाम करने को जब हम झुकते हैं और चरण स्पर्श करते हैं तो आशीर्वाद के रूप में सकारात्मक ऊर्जा बड़ों के हाथ से होती हुई छोटो के शरीर तक पहुंचती है। यह सकारात्मक ऊर्जा हमारे जीवन के लिए बहुत महत्व रखती है। इसीलिए तो हमारे पूर्वज यही कहते थे कि बड़ों के चरण स्पर्श करके उनसे आशीर्वाद लो अर्थात उनका अभिप्राय होता था कि अपने से बड़ों से सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण करो।इस तरह की संचित ऊर्जा हमें निराशा से दूर रखती है, विपत्ति में मनोबल देती है। आज भी हर कोई यही तो कह रहा हैं, मन और विचारों को सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर रखो।
इतनी सुंदर विज्ञान सम्मत हमारी भारतीय संस्कृति को भुलाकर लोगों ने हाय !* हेलो* ! कहते हुए हाथ मिलाने को फैशन बना लिया था ।
एक छोटे से जहरीले विषाणु ने आकर हमें वापस यह समझाया कि_ हाय, हेलो! तो बस दूर से बोलो।
हाथ मिलाने के चक्कर में कहीं जान ना दे बैठो।

हाथ जोड़कर नमस्कार कहो और दिल से रिश्ता निभाओ।
नमस्कार की इस उत्कृष्ट परंपरा को मेरा प्रणाम।
साथ ही आप सबको सादर नमस्कार।

श्रीलेखा

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