Sunday, July 3, 2022
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पिता, परवरिश और प्रयास (लघुकथा)

चन्द्रशेखर की सहजता और सरलता कान्हा के प्रति देखते ही बनती थी। ऑफिस से आने के बाद सदैव शांत चित्त होकर कान्हा के साथ समय व्यतीत करना जैसे चन्द्रशेखर का प्रिय शौक था। छोटे-छोटे प्रयासों में वह सदैव पार्वती का सहयोगी था। बच्चे की परवरिश की कड़ी में चन्द्रशेखर कान्हा की छोटी-छोटी जरूरतों का बारीकी से ध्यान रखता था। बच्चे की किसी भी शरारत पर कभी भी वह किसी भी प्रकार का गुस्सा नहीं करता था। कभी-कभी तो कान्हा रात को भी पापा के साथ ही खेलना चाहता था, पर चन्द्रशेखर के व्यवहार में कोई चिड़चिड़ापन नहीं था। ऑफिस का दायित्व भी कभी कान्हा की इच्छाओं के आड़े नहीं आया। ऑफिस की चिंता या काम का बोझ कभी भी कान्हा की परवरिश पर भारी नहीं पड़ा। कान्हा के बचपन से ही वह उसको रोज मंदिर लेकर जाता था। ईश्वरीय आराधना तो शायद मानव जीवन का प्रमुख उद्देश्य है। इन्हीं कारणो से वह उसे ईश्वरीय भक्ति से जोड़ना चाहता था।

परवरिश की कड़ी में वह उसे प्रकृति से भी जोड़ता था। शाम का वक्त तो कान्हा के लिए ही था। वह उसे पार्क में ले जाता, प्रकृति का सानिध्य देता। छोटी-छोटी जानकारी उसके दिमाग में रजिस्टर करता। सीखने की कड़ी में उसके प्रयास अनवरत जारी थे। बहुत सी बार कान्हा की अस्वस्थता में भी चन्द्रशेखर पूर्ण रूप से सहयोगी बना रहता था। पूरी रात पार्वती के साथ कान्हा की देखरेख में सहयोग, उसके स्वास्थ्य की चिंता शायद उसका भी दायित्व था। इसके विपरीत पार्वती ने एक ऐसा परिवार भी देखा जिसमें बच्चा पालना केवल माता का ही दायित्व था, पर माता की अपनी गृहस्थी की ज़िम्मेदारी, शारीरिक अस्वस्थता के कारण बच्चे की परवरिश में कहीं न्यूनता दिखती। प्रयासों के अंतर बच्चों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते है।

इस लघु कथा से यह शिक्षा मिलती है की परवरिश की कड़ी में प्रयासों की ऊँचाई को चरम पर ले जाना होगा। बच्चों की क्रियात्मकता की नींव रखने में माता-पिता दोनों को ही सक्रियता दिखाना जरूरी है। केवल माँ के ही प्रयास काफी नहीं है, पिता को भी पूर्ण रूप से सहयोगी बनकर प्रयासों की कड़ी से जुड़ना होगा। पिता के अनवरत प्रयास भी बच्चे की श्रेष्ठतम उन्नति के निर्धारक हो सकते है।

डॉ. रीना रवि मालपानी (कवयित्री एवं लेखिका)

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