Tuesday, June 15, 2021
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बाज़ार या अवसर,

महामारी का वैश्विक बाजार और भारत,

मेरे पिछले संस्करण की कड़ियों में अभी तक हमने इस महामारी के परिपेक्ष्य में स्वास्थ्य, सुविधाएँ और सरकार की नीतियों और योजनाओं का विश्लेषण किया था, आज मेरी कोशिश होगी कि आप इसे एक अलग नजरिये से भी देखें,जिससे शायद आप लोगों के सोच का नजरिया भी थोडा मैं बदल सकूँ |

पिछले एक साल में इस महामारी के विकराल रूप का न सिर्फ केवल हम आम जनमानस बल्कि सम्पूर्ण देश की आर्थिक व्यवस्था पर पड़ने वाले भयानक कुप्रभाओं को न सिर्फ हमने देखा है बल्कि हर किसी ने किसी न किसी रूप में उसका सामना भी किया है, इसीलिए इसके हमारे सामाजिक और मानसिक स्तर पर पड़ने वाले भीषण नकारत्मक और दूरगामी प्रभावों केसाथ साथ इनके आर्थिक परिपेक्षों केविश्लेषण की भी आज उतनी ही आवश्यकता है |

इसी विषय के साथ, मै आपकी साईंलक्ष्मी रेपल्ली, “डेली खबर” के संपादक सतम्भ “मेरी कलम और ख़बरों की खबर” में आपका स्वागत करती हूँ और आज मेरी कोशिश यही होगी कि इस महामारी के उन आर्थिक पहलुओं पर प्रकाश डालने की, जिसका सीधा प्रभाव न सिर्फ हमारे देश की अर्थ व्यवस्था पर पड़ता है बल्कि एक साधारण जनमानस भी इससे अब अछुता नहीं है |

यह कहने की अब आवश्यकता नहीं है कि इस महामारी ने जिस प्रकार से कभी न भूलने वाले सामाजिक, मानसिक और आर्थिक आघात दिए है साथ ही साथ इसके द्वारा कुछ विशेष उपलब्धियां भी हमें दी है, हमे गर्व है कि इस महामारी में जिस प्रकार से विश्व में भारत एक प्रमुख दवाई की रिसर्च, निर्माता व् निर्यातक के रूप में उभर कर सामने आया है बल्कि आगे बढ़ कर हर उस देश की मदद की है जिसे उस समय इसकी सबसे ज्यादा जरुरत थी चाहे वो सर्वसम्पन्न विकसित देश जैसे अमेरिका, जर्मनी, कनाडा हो या ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका जैसे कई विकाशशील देश ही क्यों न हो |

पर आज जब हमारे घर में यह महामारी अपने विकराल रूपधारण कर मौत का तांडव कर रही है तब जीवन रक्षक दवाइयों की कालाबाजारी, हमारी सारी उपलब्धियों पर कालिख पोत देती है, आक्सीजन जैसी सबसे जरुरी जीवन रक्षक की समय पर उपलब्ध न हो पाना, उसकी कीमत में हजार गुना वृद्धि कर वसूली, जीवन रक्षक दवाइयों का डुप्लीकेट बनाकर बाजार में बेचना, व् हर मिनट उसकी कमी से अपनों को तड़प तड़प कर मरते देखना सही मायने में ये एक इस युग की बाजार की व् संबधित कुछ लोगों की सबसे घटिया मानसिकता का परिचय इस समाज में दिया गया |

इतने सम्पन्न देश के स्वास्थ्य के व्यवस्था की सम्पूर्ण विफलता और आम आदमी की घोर विवशता को दर्शाता है जो चंद महीनों पूर्व पुरे विश्व में इस आधार पर अपनी पीठ थपथपा रहा था | इसे हमारी विश्वप्रसिद्ध स्वास्थ्य सेवाओं की विफलता कहे या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच संबधित योजनाओं और समन्वय की निष्क्रियता, ये प्रश्न मैं आप पर छोडती हूँ, पर भरे दिल से यही कह सकती हूँ कि मेरे जैसा एक आम भारतीय, इस विकराल आपदा में अपने बीच किसी अपने को खोकर इसकी कीमत चूकाने पर आज भी मजबूर है |

खैर, इस विश्लेषण को आगे बढाते हुए,वैक्सीन की बनाने के इस अंधी दौड़ में स्वदेशी वैक्सीन बनाकर, हमनें इस दौड़ में तो कुछ हद तक जीत हासिल तो कर ली पर इसके साथ, अब भी असल मुद्दा कि करीब 138 करोड़ भारतियों को कब तक उपलब्ध होगी या उन तक तक ये कब तक पहुंचेगी एक प्रश्न अभी शेष रह जाता है ? भारत देश में निर्मित दोनों वैक्सीन बनाने की छमता को आज से यदि हम दुगुनी भी कर दें तो 250 करोड़ टीकाकरण का लक्ष्य पूरा होने में शायद अगले कई महीने लग सकते है, हलाकि इस समय सीमा या लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भी कुछ अनुतरित प्रश्न अब भी है, जैसे सरकारी पैसों से उत्पादन छमता में वृद्धि के लिए केवल एक ही कंपनी को ही क्यूँ चुना गया या उसी के भरोसे क्यों रह गए ?

यह मात्र संयोग ही है की ठीक उसी कंपनी के सीईओ को खतरे की आशंका देखते हुए y + ग्रेड की सुरक्षा दिए जाने की बावजूद वो देश छोड़ कर चले जाते है और उनके देश छोड़ने का कारण भारत में किन्ही “उच्च शक्तियों” के समक्ष अपने आप को असुरक्षित महसूस करना बताया जाता है, जो की सीधे सीधे हमारे सरकार की सुरक्षा नीति पर विचार करने के साथ साथ सुरक्षा निति का घोर मजाक नहीं तो क्या है ? यदिअपुष्ट खबरों की माने तो वही कंपनी उस देश में कार्यरत अपनी कंपनी का विस्तारण कर अन्य देशों में वैक्सीन बेचने का प्रबंध भी कर रही है| फिर प्रश्न यह कि क्या भारत में उत्पादन विस्तारण के लिए सरकारी पैसों का प्रयोग किसी साजिश की तहत किया गया ? क्या देश छोड़ना भी उसी कड़ी का हिस्सा है ?

वहीँ दूसरी कंपनी भी अपने उत्पादन के विस्तारण के लिए सरकारी मदद के इंतज़ार में कई बार सरकार से बात कर उनके जवाब की प्रतीक्षा कर रही है… पर जवाब आना अभी बाकि है..? कुल मिलाकर स्वदेशी वैक्सीन से टीकाकरण, अभी पूरी तरह से दिवास्वप्न की तरह जान पड़ता है वह भी तब जब हर दिन मौतों के आंकड़े न सिर्फ डराने वाले है बल्कि हज़ारों परिवार के परिवार पूरी तरह से उजड़ रहे है और हमारे पास योजना के नाम पर सरकार के द्वारा दी जा रही आश्वासन और उस पर अपनी आस्था रखने के सिवाय कुछ भी विकल्प नहीं है |

वर्तमान परिस्थितियों के विकरालता को देख कर, मजबूर होकर सरकार के पास आनन फानन में विदेशी कंपनियों के टीकों के अनुमोदन के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं बचा | यहाँ यह बताना बहुत जरुरी हो जाता है कि कुछ कम्पनियाँ तो हमारे स्वदेशी वैक्सीन बनने केबहुत पहले से हीअपने टीके केअनुमोदन की प्रतीक्षा कर रही थी, अतः इतनी सारी कंपनियों का अनुमोदन एक ही समय पर किया जाना केवल महज संयोग ही नहीं कहा जा सकता |

सिर्फ यही नहीं, सरकार के हालिया नियमों जैसे विभिन्न स्तरों पर वैक्सीन की कीमत तय करना और प्राइवेट अस्पतालों में इनकी ऊँची कीमत पर उपलब्धता ने न सिर्फ स्वयं सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह उठाये है बल्कि इस भयंकर परिस्थिति में अपने परिवार के प्राणों को बचाने की जद्दोजहद में, एक आम आदमी के साथ जले में नमक का काम भी किया है |

उपरोक्त विश्लेषणों के आधार पर सारांश में कहें तो इसका सीधा नकारत्मक प्रभाव न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था बल्कि आम जनता की सामाजिक, मानसिक और आर्थिक व्यवस्था पर पड़ना लाजिमी है, इसे शंशय कहे या डर, कि वैक्सीन व्यव्स्याय की इस अंधी दौड़ में कही हमारा देश एक वश्विक बाज़ार और हमारे लोग एक प्रयोगात्मक जीव बन कर न रह जाये |

अन्तत, “महामारी के इस वैश्विक बाजार” के विश्लेषण को यहीं अर्ध विराम देते हुए, अर्ध विराम भी इसलिए की अभी भी इसके कई पर्यायों का सही विश्लेषण सामने आना बाकि है जैसे मौतों के इस विकराल रूप में भी उन्नत देश क्या पेटेंटनियमों में ढील देंगे ताकि 80% विकाशशील या अविकसित देशों के अरबों जनमानसों को एक रियायत दर और सबसे जरुरी जल्द से जल्द वैक्सीन की उपलब्धि हो सके| पर जर्मनी,ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, जापान और ब्राजील और यूरोपियन यूनियन के कुछ विकशित देशों के तात्कालिक प्रतिक्रिया देखे तो लगता है की शायद इनकी सदियों पुरानी “अश्वेत और गरीबी” के प्रति मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है.

यह और भी भयावह हो जाता है जब दुनिया के सबसे अमीर और बौधिक व् तकनिकी संसाधनों से सुसज्जित माइक्रोसॉफ्ट के सह संस्थापक “बिल गेट्स” जब ये कहते है कि “विकाशील व् अविकसित देशों को पेटेंट फार्मूला में छूट नहीं दी जानी चाहिए, क्यूंकि यह एक बौधिक छमता और संपदा का मामला है और इसके व्यसायिकीकरण में केवल उसका ही अधिकार है” प्रश्न केवल इतना ही रह जाता हैं कि, अब और कितनी लाशों की कीमत पर ..?”

इन्ही कुछ प्रश्नों के साथ, “डेली खबर” से मै “साईंलक्ष्मी रेपल्ली“, सम्पादकीय स्तम्भ के “मेरी कलम और खबरों की खबर” से आज यही छोड़े जा रही हूँ और मुझेउम्मीद है कि मेरा यह संस्करण इस महामारी के पीछे छिपे आर्थिक लक्ष्य, व्यसायिकीकरण, प्रतिस्पर्धा, साजिशें और सबसे बड़ी, हमारी व्यवस्था के विफलता ने शायद हम सबकी जीने की गारंटी को इन सबके लिए वैश्विक बाज़ार के रूपमें एक “अवसर” मात्र के रूप में प्रस्तुत कर, हमे एक नये नजरिये से इसे देखने और सोचने पर मजबूर कर दिया है |

इसलिए आप सबसे विनम्र अपील और प्रार्थना है कि आप सब घर पर रह कर स्वस्थ रहें और सरकार के द्वारा जारी और निर्धारित नियमों का पालन करें और अपने चाहने वालों को भी सरकार के द्वारा जारी और निर्धारित नियमों का पालन करने हेतु प्रेरित करें …..

यहीं अंत करते हुए आप सबकी प्रतिकिर्या के इंतज़ार में ….,

साईंलक्ष्मी रेपल्ली
“मेरी कलम और ख़बरों की खबर”

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