Wednesday, August 4, 2021
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बैकयार्ड कुक्कुट पालन छोटे किसान व भूमि-हीनों के लिए एक लाभदायक व्यवसाय,

राजनांदगाव / रिलायंस फाउंडेशन और कृषि विज्ञान केंद्र सुरगी राजनांदगांव के सहयोग से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के फाउंडेशन दिन के उपलक्ष्य में राजनांदगांव के बचत समूह की महिलाओं के साथ ऑडियो कॉन्फ्रेंस के द्वारा मुर्गी पालन विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया.इस कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र से डॉ बीएस राजपूत एवं विषय विशेषज्ञ डॉक्टर नूतन रामटेके जी ने भाग लिया इस कार्यक्रम में रिलायंस फाउंडेशन के टीम लीडर देवेंद्र पटेल,बालकिशन यदुवंशी अशोक मिश्रा एवं मिथलेश साहू ने कार्यक्रम में भाग लिया इस कार्यक्रम में राजनांदगांव डोंगरगढ़ और डोंगरगांव के 16 गांव से 86 प्रतिभागियों ने भाग लिया.

कार्यक्रम का उद्देश्य था कुकुटपालन के द्वारा आजीविका मैं वृद्धि इस कार्यक्रम के लिए डॉ नूतन रामटेके जी ने कुकुट पालन से संबंधित जानकारी बचत समूह की महिलाओं के साथ में शेयर किया,डॉ नूतन ने बताया कि मुर्गी पालन आज व्यवसाय का रूप ले चुका है.बैकयार्ड कुक्कुट पालन का छत्तीसगढ़ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक विशेष महत्व है यह कृषकों के लिए आय एवं जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन बन गया है, कुक्कुट / मुर्गी पालन का व्यवसाय कम जगह कम खर्च में किया जा सकता है ऐसे किसान जिनके पास बहुत कम जमीन या भूमिहीन मजदूर घर के पिछवाड़े में खुली बाडे में कुक्कुट/ मुर्गी का पालन करके लाभ कमा सकते हैं.

डॉ नूतन ने कुक्कुट पालन के लाभ बताते हुए कहा की मुर्गी पालन ग्रामीण कृषिकों एवं युवाओं को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराता है साथ ही साथ ही पौष्टिक आहार जैसे मांस अंडा भी उपलब्ध कराता है.इस पेशे में अधिक भूमि की आवश्यकता नहीं होती अतः इसे भूमिहीन कृषक भी अपना सकते हैं घर में बचे हुए अनाज सब्जी आदि का उपयोग कुक्कुट के आहार के रूप में किया जा सकता है अतः मुर्गी पालन निम्न गुणवत्ता के आहार को खाकर उच्च गुणवत्ता वाले मांस एवं अंडे में बदल देती है.बैकयार्ड मुर्गी पालन के लिए उन्नत नस्ल का चुनाव कर कृषक कम लागत में अधिक से अधिक लाभ कमा सकते हैं

बैकयार्ड मुर्गी पालन हेतु मुर्गियों में निम्नलिखित विशेषताएं होनी चाहिए

▪️ग्रामीण परिवेश में आसानी से पाली जा सके
▪️शारीरिक बनावट अच्छी हो
▪️रोग प्रतिरोधक क्षमता हो
▪️जिनकी मृत्यु दर कम हो
▪️अच्छा अंडा व मांस उत्पादन करने की क्षमता हो

राजनांदगांव क्षेत्र के परिपेक्ष में डॉ नूतन जी ने बताया कि कड़कनाथ एवं वनराजा प्रजातियां इस क्षेत्र के लिए बेहद उपयुक्त है.मुर्गी पालन से पहले किसान बहनों और भाइयों को यह तय करना होता है कि वह मुर्गी पालन मांस के लिए करना चाहते हैं या अंडों के लिए.मांस उत्पादन के लिए ब्रायलर प्रजाति के मुर्गियां भी अच्छी होती हैं अंडों के लिए लेयर प्रजाति की मुर्गियां इस्तेमाल की जाती हैं.वनराजा दोहरी प्रजाति का है जिसके मांस व अंडे दोनों ही बेहतर होते हैं और ग्रामीण इलाकों में बिना किसी जाली के इस प्रजाति को बहुत अच्छे तरीके से पाला जा सकता है. वनराजा प्रजाति से पूरे वर्ष में लगभग 180-200 अंडे प्राप्त किए जाते हैं और प्रति अंडे का औसत वजन 54 ग्राम तक होता है और लगभग 1 माह में 1 किलो से 1.25 किलो तक बढ़ सकते हैं.स्थानीय स्तर पर 25 से ₹30 प्रति नग की दर से वनराजा के चूजे को किसान प्राप्त कर सकते हैं.

कड़कनाथ एक और प्रजाति है जो राजनांदगांव के क्षेत्र के लिए बहुत अनुकूल है.
कड़कनाथ को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन यानी जी आई टैग प्राप्त है यह मध्य प्रदेश के धार और झाबुआ क्षेत्र में विशेष कर पाया जाता है. छत्तीसगढ़ सरकार ने भी इस प्रजाति के विस्तार के लिए प्रयास किया एवं आज यह छत्तीसगढ़ के बहुत से जिलों में सफलतापूर्वक इसका पालन किया जा रहा है.बैकयार्ड मुर्गी पालन में इस प्रजाति को बहुत ही सफलतापूर्वक पाला जा रहा है.कड़कनाथ के मांस के लिए किसका उपयोग किया जाता है.कड़कनाथ के मांस में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है व आयरन अधिक होता है. एक माह में यह एक से डेढ़ किलोग्राम तक वजन में बढ़ जाते हैं और प्रतिवर्ष इनके डेढ़ सौ अंडे तक प्राप्त किए जाते हैं.

किसान भाइयों को कड़कनाथ के अंडों से चूजे प्राप्त करने में कठिनाई आती है क्योंकि कड़कनाथ अपने अंडों को नहीं सेते, कड़कनाथ के अंडे से चूजे प्राप्त करने के लिए किसानों को सलाह दी जाती है कि वे कड़क कड़कनाथ के साथ में देसी मुर्गियों का पालन अवश्य करें और कड़कनाथ के अंडों को देसी मुर्गियों के अंडे के साथ में मिलाने से देसी मुर्गियां कड़कनाथ के अंडों को भी सेती हैं जिससे अंडे से चूजे प्राप्त किए जाते हैं.

डॉ नूतन ने आगे जानकारी देते हुए बताया कि कुकुटपालन सिर्फ मुर्गियों का पालन ही नहीं होता बल्कि बटेर भी पाला जा सकता है. जापानी बटेर प्रजाति सबसे अच्छी मानी जाती है यह 6 सप्ताह में लगभग डेढ़ सौ ग्राम तक हो जाती है. बटेर के चूजे 15 से ₹20 प्रति चूजे की दर से प्राप्त किए जा सकते हैं और और जब वह बड़े होते हैं तो 70 से ₹80 प्रति नग में उनकी बिक्री हो जाती है. बटेर मुर्गी पालन की तुलना में काफी कम खर्चीला व्यवसाय है.

आहार प्रबंधन – बैकयार्ड मुर्गी पालन में आहार पर खर्च कम आता है क्योंकि मुर्गियां घूम घूम कर कीड़े मकोड़े खाकर घर के बच्चे अनाज को खा कर अपना भोजन प्राप्त कर लेती हैं परंतु इन सबसे मुर्गियों को पूरी मात्रा में पोषक तत्व उपलब्ध नहीं हो पाते इसलिए इनके अतिरिक्त इनको कुछ मात्रा में संतुलित आहार प्रदान करना चाहिए संतुलित आहार के साथ-साथ साफ पानी अवश्य दें उनके पीने के पानी के बर्तन और रहने की जगह की साफ सफाई नियमित रूप से अनिवार्य किए जाने चाहिए

स्वास्थ्य प्रबंधन – मुर्गियों में पाए जाने वाले मुख्य बीमारी रानीखेत है इस बीमारियों से बचाव हेतु मुर्गियों को इस बीमारी का टीकाकरण अवश्य कराएं इसके लिए 6 माह के अंतराल में रानीखेत बीमारी का टीका लगवाना लाभदायक होता है 2 से 3 माह के अंतराल में आंतरिक व बाह्य परजीवी नाशक दवा अवश्य देना चाहिए.

किसान भाई एवं बहन बैकयार्ड मुर्गी पालन कर बेहतर लाभ कमा सकते हैं. डॉ नूतन ने आशा व्यक्त किया कि आज के इस इस प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ी हुई महिलाएं बैकयार्ड मुर्गी पालन को अपना करके एक बेहतर आजीविका का साधन प्राप्त कर सकती हैं!

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