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अन्नप्राशन संस्कार: अन्नप्राशन संस्कार का हिदू धर्म में सबसे बड़ा महत्व है। अन्नप्राशन संस्कार 16 संस्कार के जन्म स्थान पर आता है। जन्म के छह महीने तक बच्चे के जन्म के बाद माता के दूध पर ही प्रतिबंध रहता है। इसके बाद जब पहली बार संस्थान को पारंपरिक अनाज के साथ अनाज दिया जाता है तो उसे अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है।
बच्चे के शारीरिक विकास के लिए अन्नप्राशन संस्कार किया जाता है। आइये जानते हैं अन्नप्राशन संस्कार का महत्व, विधि और लाभ।
अन्नप्राशन संस्कार कब करें? (अन्नप्राशन संस्कार समय)
बच्चा जब छठवें या आठवें महीने का हो जाता है तब उसका अन्नप्राशन संस्कार करना ठीक रहता है, क्योंकि इस समय तक उसके दांत निकल आते हैं। ऐसे में वह अनाज को पचाने में सक्षम नहीं होता है।
अन्नप्राशन संस्कार का महत्व (अन्नप्राशन संस्कार महत्व)
भगवद गीता के अनुसार केवल शरीर का पोषण नहीं होता, अपितु मन, बुद्धि, तेज और आत्मा का भी पोषण होता है। अन्न को म्युचुअल का प्राण कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार शुद्ध आहार से ही तन और मन दोनों शुद्ध होते हैं शरीर में सत्वगुण की वृद्धि होती है। अन्नप्राशन के माध्यम से बच्चों के शुद्ध,सात्विक और लघु अन्न ग्रहण करने की शुरुआत की जाती है, जिससे उनके विचार, भावनाओं में सकारात्मकता पैदा होती है।
अन्नप्राशन संस्कार विधि (अन्नप्राशन संस्कार विधि)
अन्नप्राशन संस्कार के दिन शुभ उत्सव में बच्चे के माता-पिता अपने ईष्ट देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। उन्हें चावल के खेड का भोग लगाया जाता है और फिर चांदी के कटोरी-छम्मच से ये खेड बच्चे को चटाई जाती है. चावल के दाने से बनी होती है देवों की मणि इसलिए अन्नप्राशन संस्कार में बच्चे को खिलाते समय यह मंत्र बोलना चाहिए। – शिवौ ते स्तं वृहियवबलसावदोमधौ। एतौ यक्ष्मं वि वधेते एतौ मुञ्चतो अंहासः॥ है.
यानी – हे ‘बालक! जौ और चावल के लिए बलदायक और पुष्टिकारक होन। क्योंकि ये दोनों पवित्र यक्ष्मा-नाशक हैं तथा देवान्न होने से पापनाशक हैं।’
अस्वीकरण: यहां चार्टर्ड सूचना सिर्फ अभ्यर्थियों और विद्वानों पर आधारित है। यहां यह जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह के सिद्धांत, जानकारी की पुष्टि नहीं होती है। किसी भी जानकारी या सिद्धांत को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।
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