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मुंडन संस्कार: हिंदू धर्म में बच्चे को संस्कारवान और मानसिक-शारीरिक रूप से तंदरुस्त बनाने के लिए सेल संस्कार किया जाता है। इनमें से आठवां संस्कार चूड़ाकर्म संस्कार है, जिसे मुंडन भी कहा जाता है।
शास्त्रों में लिखा है – तेन ते आयुषे वपामि सुश्लोकाय स्वस्तये। अर्थात, मुंडन संस्कार से जातकों का जन्म होता है। बच्चे में गर्भावस्था के उपकरणों को दूर करने के लिए मुंडन संस्कार किया जाता है, ये बच्चे के स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़रूरी है। आइये जानते हैं मुंडन संस्कार कब और कैसे करें, इसके महत्व।
पूर्व जन्म के पाप से मुक्ति है मुंडन संस्कार (Mundan Sanskar SIgnificance)
धार्मिक मान्यता है कि जब शिशु का गर्भ बाहर आता है तो उसके सिर के बाल उसके माता-पिता के बताए होते हैं। ये बाल कलाकार होते हैं। बच्चे के गर्भ के बाल काटने के बाद ही उसकी बुद्धि नष्ट होती है, यहां तक कि गर्भ के बाल काटने से बच्चे के पूर्व जन्म के शापों का मोचन हो जाता है। बच्चों के बालों में जो कितानु परिवार रह जाते हैं वो भी नष्ट हो जाते हैं। बच्चे का बल, तेज और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए मुंडन संस्कार को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है।
जन्म के कितने समय बाद करना चाहिए मुंडन (Mundan Sanskar Time)
शिशु के जन्म के बाद 1 वर्ष के अंत या तीसरे, पांचवे या तीसरे वर्ष में शुभ अभिषेक देखकर ही मुंडन संस्कार जाना की प्रथा है। पंचांग के मुंडन संस्कार के लिए द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी और त्रयोदशी तिथि के अनुसार शुभ माना जाता है। साथ ही अश्विनी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, पुनर्वसु, चित्रा, स्वाति, ज्येष्ठा, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्रों में भी चूड़ाकर्म संस्कार करना उत्तम होता है।
मुंडन संस्कार की विधि (मुंडन संस्कार विधि)
मुंडन संस्कार घर के आंगन में तुलसी के पास या फिर किसी धार्मिक स्थल पर भी किया जा सकता है। पंडित जी पहले इसमें रहते थे। माँ बच्चे को अपने गोद में लेकर उसका मुख पश्चिम दिशा में अग्नि की ओर रखती है। इसके बाद बच्चे के बाल निकलते हैं और फिर गंगाजल से उसका सिर धोकर हल्दी का लेप निकलता है।
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