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भिलाई 05.12.2025

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दुर्ग–भिलाई की रफ़्तार भरी जिंदगी के बीच फील परमार्थम फाउंडेशन जैसी पहल यह याद दिलाती है कि मानवता अभी भी समाज की सबसे मजबूत नींव है। 23 वर्षीय इंजीनियर अमित राज ने 2018 में एक दृश्य देखा एक मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति कूड़े से खाना खोज रहा था। यह सिर्फ एक क्षण नहीं था, बल्कि वह सवाल था जिसने अमित के अन्तःकरण को झकझोड़ दिया। उन्होंने तय किया कि ऐसे किसी भी व्यक्ति को भूखा नहीं सोने देंगे।

यही संवेदना आगे चलकर ‘फ़ील परमार्थम फ़ाउंडेशन’ बनी। लेकिन मानसिक रूप से अस्वस्थ, भटके हुए और असहाय लोगों तक पहुँच बनाना आसान काम नहीं था। इनके लिए आश्रय की जरूरत थी, व्यवस्था की जरूरत थी, और सुरक्षा की जरूरत थी। ऐसे समय में अमित ने भिलाई इस्पात संयंत्र से सहयोग माँगा। संयंत्र ने सेक्टर–3 में स्थान उपलब्ध कराया और वहीं खड़ा हुआ—‘फील परमार्थम’, एक ऐसा घर जो उन लोगों के लिए है जिनके पास कोई घर नहीं।

आज फील परमार्थम सिर्फ एक आश्रय नहीं, बल्कि पुनर्वास, देखभाल और गरिमा का केंद्र बन चुका है। दुर्ग और आसपास के 06 जिलों से भटके हुए और मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति यहाँ लाए जाते हैं। उन्हें चिकित्सा सुविधा मिलती है, समय पर भोजन मिलता है, और सबसे महत्वपूर्ण एक सम्मानजनक वातावरण मिलता है। वर्तमान में यहाँ 89 लाभार्थी रह रहे हैं, जिसमें लगभग आधे पुरुष और आधी महिलाएँ है। संस्था द्वारा अब तक उपचार व खोजबीन के बाद 50 से अधिक व्यक्तियों को उनके परिवारों से पुनर्मिलन कराया जा चुका है।

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लगभग 22 सदस्यीय स्टाफ, नर्स और देखभालकर्ता इस आश्रय को सिर्फ सेवा का स्थान नहीं बल्कि एक जिम्मेदारी की तरह निभाते हैं। हाल ही में भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा आश्रम की बाउंड्री वॉल का निर्माण करवाना इस साझेदारी को और मजबूत करता है। अमित बताते हैं कि बीएसपी के सहयोग के बिना इतने जीवन बदल पाना संभव नहीं हो सकता था।

भिलाई इस्पात संयंत्र आज अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को निभा रहा है व ऐसे कई संस्थानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एक बेहतर समाज गढ़ रहा है। ‘फील परमार्थम’इसका जीवंत उदाहरण है, जहाँ संयंत्र के अधिकारी, कर्मचारी और भिलाई के व्यवसायी समुदाय भी स्वेच्छा से आगे आकर सहयोग दे रहे हैं—किसी ने कपड़े उपलब्ध कराए, किसी ने दवाएँ, तो किसी ने अपना समय। यह सहयोग इस बात का प्रमाण है कि जब कोई व्यक्ति या संस्था किसी नेक कार्य की शुरुआत करती है, तो दुनिया उसके साथ चल पड़ती है। संवेदना का एक छोटा सा बीज अनेक हाथों की गर्माहट से वटवृक्ष बन जाता है, और फील परमार्थम आज उसी सामूहिक करुणा का मजबूत प्रतीक है।

फील परमार्थम यह याद दिलाता है कि सामाजिक परिवर्तन केवल बड़े नारे या योजनाओं से नहीं, बल्कि संवेदनशील लोगों के छोटे लेकिन दृढ़ कदमों से शुरू होता है। ऐसे प्रयास न केवल असहायों के जीवन में रोशनी लाते हैं, बल्कि समाज को यह भी सिखाते हैं कि करुणा भी एक संसाधन है—और शायद सबसे महत्वपूर्ण भी |

Abhilash Dikshit

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