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Hate Speech: हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा शिकायत हो या न हो फिर भी दर्ज हो FIR : राज्य सरकारों को बताया था नपुंसक

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Hate Speech: हेट स्पीच पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा शिकायत हो या न हो फिर भी दर्ज हो FIR : राज्य सरकारों को बताया था नपुंसक

प्रतीकात्मक फोटो सुप्रीम कोर्ट सोशल मीडिया

लगातार बढ़ते जा रहे हेट स्पीच के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती बरती है. नफरती भाषणों के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत ने कड़ा रुख अपनाने का निर्देश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि ‘ऐसे भाषण जो नफरत से भरे हों उन्हें गंभीर अपराध’ करार दिया जाए. इसके साथ ही भाषण देने वालों के खिलाफ मामला दर्ज किया जाए.

इसके साथ ही भाषण देने वालों के खिलाफ मामला दर्ज किया जाए. कोर्ट ने कहा कि देश के धर्मनिरपेक्ष ताने बाने को प्रभावित करने वाले इन भाषणों को "गंभीर अपराध" माना जाए. अगर किसी ने इनके खिलाफ शिकायत न भी की हो, तो भी मामला दर्ज कर लिया जाए.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश वकील निज़ाम पाशा की याचिका पर दिया है. याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि सभी राज्यों में नोडल ऑफिसर की नियुक्ति होनी चाहिए, जो हेट स्पीच के मामलों में कार्रवाई के लिए जिम्मेदार हो.

जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने हेट स्पीच केस से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिया. बेंच ने कहा कि अगर ऐसे मामलों में FIR दर्ज करने में देरी की जाएगी तो उसे कोर्ट की अवमानना के तौर पर देखा जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, हेट स्पीच देने वाला व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति या समुदाय का हो, उसे कानून तोड़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती है.

स्वतः संज्ञान लेकर होगी कार्रवाई

कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यह सुनिश्चित करेंगे कि जब भी कोई भाषण या कोई कार्रवाई होती है, तो आईपीसी की धारा 153ए, 153बी और 295ए और 505 के तहत स्वत: संज्ञान से कार्रवाई की जाएगी. कोई शिकायत नहीं आने पर भी मामला दर्ज करने और कानून के अनुसार अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया.

लापरवाह अफसरों पर भी होगी कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ही आदेश साल 2022 में भी दिया था. अपने 2022 के आदेश के दायरे को सुप्रीम कोर्ट ने तीन राज्यों , उत्तर प्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड से बढ़ाते हुए पूरे देश में लागू किया है. इसे लेकर जस्टिस केएम जोसेफ और बीवी नागरत्ना की पीठ ने अधिकारियों को यह भी स्पष्ट कर दिया कि कार्रवाई करने में किसी भी तरह की हिचकिचाहट को शीर्ष अदालत की अवमानना ​​​​के तौर पर देखा जाएगा. ऐसे में लापरवाह अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जाएगी.

साल 2022 में अपना ये फैसला देते हुए न्यायालय ने कहा था, ‘धर्म के नाम पर हम कहां पहुंच गए हैं?’ पीठ ने कहा था कि ‘जजों का राजनीति से कोई लेनादेना नहीं होता है और पहले पक्ष या दूसरे पक्ष के बारे में नहीं सोचते और उनके दिमाग में केवल एक ही चीज है भारत का संविधान.’

पहले भी चिंता जता चुका है कोर्ट

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट मार्च 2023 में भी हेट स्पीच की घटनाओं चिंता जता चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धर्म को राजनीति से मिलाना ही हेट स्पीच का स्रोत है. जस्टिस केएम जोसफ और जस्टिस बी वी नागरत्ना की पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा था कि क्या सरकारें नपुंसक हो गई हैं, जो खामोशी से सब कुछ देख रही हैं? आखिर इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही? हमारी चिंता की वजह है कि राजनेता सत्ता के लिए धर्म के इस्तेमाल को चिंता का विषय बनाते हैं. इसके साथ ही जस्टिस नागरत्ना ने कहा था कि जुलूस निकालने का अधिकार अलग बात है और उस जुलूस में क्या किया या कहा जाता है, ये बिलकुल अलग बात है. पीठ ने कहा कि इस असहिष्णुता और बौद्धिकता की कमी से हम दुनिया में नंबर एक नहीं बन सकते. अगर आप सुपर पावर बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको कानून के शासन की जरूरत है.

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